झांसी बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में एक बार फिर अनूठी पेंटिंग ने विश्वविद्यालय के छात्रों को चौंकाया

झांसी बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में एक बार फिर अनूठी पेंटिंग ने विश्वविद्यालय के छात्रों को चौंकाया बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के बाहर एक्ज़ीबिशन प्रदर्शनी का आयोजन है। कलाकारों ने कई प्रकार के हस्तशिल्प स्टॉल लगाए हैं।
जिसमें बिहार की प्राचीन कला मधुबनी पेंटिंग ने एक बार फिर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में लगे हस्तशिल्प प्रदर्शनी में बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की पहचान मानी जाने वाली मधुबनी पेंटिंग ने एक बार फिर अपनी चमक बिखेरी है। यह कला अद्भुत हैं। मधुबनी बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की एक प्राचीन कला है।
पेंटिंग पारंपरिक रूप से झोपड़ियों की मिट्टी की दीवारों और फर्श पर की जाती थी, लेकिन अब वे कपड़े, हस्तनिर्मित कागज और कैनवास पर भी की जाती हैं और इस्तेमाल किए जाने वाले माध्यम भी उसी के अनुसार विकसित हुए हैं। यह कला अपनी सूक्ष्म डिज़ाइन,जटिल रंग संयोजन और लोककथाओं के चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। मधुबनी पेंटिंग का इतिहास हज़ारों वर्षों पुराना माना जाता है। इसे सबसे पहले रामायण काल में राजा जनक की बेटी सीता के विवाह के समय बनाई गई दीवार चित्रकारी के रूप में जाना जाता है। मधुबनी पेंटिंग न केवल भारतीय संस्कृति की पहचान है, बल्कि यह विदेशों में भी अपनी अलग पहचान बना रही है। यूरोप, अमेरिका और जापान जैसे देशों में इसकी भारी मांग है। पारंपरिक विषयों जैसे कि हिंदू देवी-देवताओं, प्रकृति और सामाजिक मुद्दों को इन पेंटिंग्स में उकेरा जाता है। कला आज महिलाओं के सशक्तिकरण का भी माध्यम बन रही है। महिलाएं, जो पहले आर्थिक रूप से कमजोर थीं, आज मधुबनी पेंटिंग के जरिए अपनी पहचान बना रही हैं।
ललितपुर की चंदेरी साड़ी है। कुंभी जो जल में पाई जाती थी उससे बने डालियां जो कभी हमारे पर्यावरण को भी प्रदूषण करती थी आज वह हमारे जल को साफ सफाई भी हो रहीं हैं। यह सभी आइटम जो आज के टाइम में विलुप्त हो चुके हैं उनको पुनः जीवित करने के लिए बुंदेलखंड के लोगों ने बीड़ा उठाया है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में छात्र देखकर खुश हुए और पहचाना कि आज हम कहां पहुंच गए हैं हर एक आइटम जहां प्लास्टिक का आ रहा है हम उसका उपयोग कर रहे हैं पर हम अपने लोकल और लोकल आइटम को भूलते जा रहे हैं तो यह प्रदर्शनी बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में उद्यमियों के लिए एक अवसर के रूप में है जो लोकल का स्वर आइटम बना रहे हैं और उनको अब बेचा जाएगा सरकार भी इनकी लिए काफी योजनाएं चल रही हैं बैंकों से लोन दे रहे हैं। और अपना उद्योग स्थापित करने के लिए सहायता कर रही है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के बाहर एक्ज़ीबिशन में प्रदर्शित मधुबनी पेंटिंग्स को वहां देखने वाले दर्शकों में पेंटिंग को काफी सराहा गया है। साथ ही सरकार भी इस कला के संरक्षण और इसे प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं चला रही है। वाकई मधुबनी पेंटिंग न केवल बिहार की, बल्कि पूरे भारत की संस्कृति और विरासत का गौरव है। वोकलफॉरलोकल के समर्थक के रूप में हम लुप्त हो चुकी भारतीय कला को पुनर्जीवित करने तथा भारतीय शिल्प कौशल का समर्थन करने में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर मुकेश पांडे जी ने भी हस्त शिल्प कलाकारों जो बुंदेलखंड के सात जिलों से चित्रकूट प्रयागराज वाराणसी फिरोजाबाद ललितपुर महोबा के कलाकारों ने झांसी बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के सामने अपनी प्रदर्शनी लगाई है। प्रदर्शनी 12 दिसंबर तक लगाई गई है।
लघु उद्योग में हस्तशिल्प उद्यमी में मूंज से बनी झबिया,मौनी और दऊरी के दर्शन हुए तो मानस पर अपने गांव की यादें चलचित्र की भांति रेंग गईं। याद आया कि कैसे उनका प्रयोग होता था। तब हस्तशिल्प हर पुरुष और स्त्री के लिए वांछनीय गुण माना जाता था। विकास की पश्चिमी बयार ने हमें अपनी जड़ों से दूर कर दिया है। ये उत्पाद यहां बुंदेलखंड स्तरीय हस्तशिल्प मेले में अमेठी के एक हस्तशिल्पी लेकर हैं। हस्तशिल्प स्वरोजगार और आत्म निर्भरता का एक बड़ा साधन है, हम अपने पूर्वजों के इस मंत्र को भूल गए हैं। आज देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में हम युवाओं को हस्तशिल्प की ओर मोड़कर देश में आत्मनिर्भरता की मधुर और मनमोहक बयार फैला सकते हैं। सभी हस्तशिल्पियों को नमन। उमेश शुक्ला सर

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